Friday, 6 January 2017

बैंककर्मियों के लिए नोटबंदी बना 'पाइल्स', दर्द किसे बताएं-

बैंककर्मियों के लिए नोटबंदी बना 'पाइल्स', दर्द किसे बताएं-

भाई नोटबंदी के 50 दिन बीत गए हैं, हाँ भाई उससे भी ज्यादा दिन हो गए हैं पर अभी तक पिछऊटा का घाव बन गया है. यह बात बड़े बिजसनेस को नहीं समझ आएगी काहे की उनके काम तो ऊपर से ही हो जाता है, चाहे वेस्टर्न कमोड की तरह. लाइन में लगाने की और कुछ जरुरत नहीं. आम लोग थोड़े ही है जो की लाइन में लगकर सरकार को कोसेंगे, कोसो-कोसो दूर से. उनके काम तो बन जाता है फ़ोन पर कोसो-कोसो दूर से. सही बोला ना की नहीं बोला, सही क्या गलत क्या जो मन में आया बोलो काहे की सरकार भी तो बस बोलती जा रही है. 

लेकिन इस नोटबंदी का दर्द तो बैंककर्मी ही बता सकता है. हम सब तो बस कभी सरकार तो कभी बैंक वालों की धज्जिया उड़ाने में लगे रहते हैं. बस अब हमको भी मन की बात की आदत लग गई है. लेकिन  सुनेगा जो कि नोटबंदी में हमारे सरकार के लिए रात भर काम किये, इनकी तो कोई नही सुनेगा, यहाँ तक की जब रात में घर गए तो बीवी ने भी उल्टा सुना दिया और बच्चों की छोड़ो उनका तो आदत है बोलना , जन्मसिद्ध अधिकार. लेकिन इनको महसूस किया जा सकता है.

इनका दर्द वाकई में किसी बवासीर यानि की पाइल्स से कम नहीं हैं. क्योंकि यह सब अपना दर्द चाह कर भी बयां नहीं कर सकते क्योंकि पाइल्स की तरह इसका भी कोई पुख्ता इलाज़ नहीं हैं दीवारों हक़ीम की नशीहत फ्री में मिल जाएगी, यह बात अलग है. इनका दर्द भी फेसबुक पर बयां हुआ पर इलाज़ इसका क्या हुआ? आप तो जानते ही है! और यह दर्द बयां कर के भी क्या हासिल कर लेंगे क्योंकि सरकार को काम चाहिए और हमको चाहिए  नोट और वह भी सौ टकिया. तो इनको सुबह से रात तक बैठने से तो अपच तो हो गया ही होगा बिलकुल ब्लैक नोट की तरह बाहर भी आ रहा होगा, तो बेहतर होगा की इलाज कराये क्योंकि पाइल्स का जन्म यहीं से होता है. हो सके तो नोटबंदी और सेहत दोनों का ख्याल रखें क्योंकि अगर किसी ने बैंक में घपला किया या फिर सेहत बिगड़ गई तो फिर आप कुर्सी पर बैठने के काबिल नहीं रहोगे!

Wednesday, 4 January 2017

महिलाओं को 'हिलाओं' बनाने में भी पुरुषों का हाथ-

महिलाओं को 'हिलाओं' बनाने में भी पुरुषों का हाथ-

जी हाँ, यह अब तक का सबसे बड़ा खुलासा है. खुलासा करने वाली कोई महिला नही बल्कि एक जवान  लड़का कर रहा है. यह कोई गलत बात नहीं हैं आपने भी तो देखा ही होगा, ये 'हिलाओं' वाला कारनामा और यह भी हो सकता है की आपने किया भी हो! क्योंकि किसके दिमाग में कब दाद-खुजली होने लगे और हाथ उसको खुजला - खुजला कर के 'हिलाओ' वाली प्रक्रिया में प्रिय बना देते हैं. जब हमारी नज़र पड़ती हैं तो फिर मुस्कुराने से भी नहीं कतराते, मंद-मंद गुलाटी मारती मुस्कान, आह! कितना मजा आ रहा हैं ना! पढने में भी और यह कारनामा करने में तो और भी मजा ही आया होगा. मजे के लिए तो हम कुछ भी कर देते है इसके नमूने आपको पब्लिक टॉयलेट से लेकर के हर जगह देखने को मिलते है.

'हिलाओ' दिखेगा बस और ट्रैन में- 

जी हां, बिलकुल वही जहाँ पर लडकिया /महिलाएं बैठती है. वहीं पर यह कारनामा दिखता है. सीट के ऊपर लिखा होता है महिलाओ और कुछ लोग उसको हाथ से हिला-हिला कर के 'हिलाओं' में तब्दील कर देते है. इससे यह पता चलता है की वो लोग हिलाने में माहिर हैं. लेकिन ऐसा छेड़छाड़ तो पुरुषों के साथ तो नहीं करते हैं ये खुरापाती वाले लोग. अरे, भाई ऐसे ही हिला कर जिंदगियां चल जाएगी हासिल का होगा, बाबाजी का... जो भी समझ लो, क्योंकि तुम्हारी सोंच की बराबरी मैं नहीं कर सकता हूँ. 


ट्रेन और पब्लिक टॉयलेट का दरवाजा या प्यार का गेट- 

'हिलाओं' तक ही इनका कारनामा नहीं रुकता, ट्रेन और पब्लिक टॉयलेट के दरवाजा को तो प्यार की चिट्ठी बना दिए हैं. सोना, मोना, कोना आदि के नाम मोबाइल नंबर तक लिख देते है. इतना ही नहीं, मिलने का टाइम और पता भी, जैसे की लडकिया इनकी खेत की उपज हों. भाई ये कौनसा प्यार है तुमरा, जरा हमे भी बता दो, ताकि तुमको इसके लिए कोई रत्न दिलावे दे. आखिर महिलाओं के प्रचार-प्रसार में इतना योगदान देने के लिए कोई सम्मान तो देना पड़ेगा ना. या फिर बस ऐसे ही छुप-छुप के 'हिलाओं' कार्यक्रम करते रहोगे. 

जुबानी गाली जो खानदानी है -

जुबानी गाली जो खानदानी है -

गालियाँ तो गलियों की पहचान करवाती हैं. गालियाँ देने से काम सरल और सहज हो जाता है. गाली भी लेख का विषय बन जाएगी यह मुझे भी नहीं पता था लेकिन गाँव का गली जब फेसबुक के जरिए जुड़ा तो पता चला कि यह गाली भी बङे कमाल की चीज है तो फिर सोचा कि चलो फिर गाली - वाली बात को ध्यान में रखते हुए कुछ मौज कर दिया जाए. जब मैं दसवीं कक्षा में था तो मुझे देर रात तक पढ़ाई करनी पड़ती थी ताकि मम्मी से कोई गाली सुनने को ना मिले और मम्मी भी सुबह जल्दी उठकर काम करने लगती ताकि दादी उनको भोरे - भोरे खरी खोटी ना सुना दे. गांव में गाली हर गली में अलग अलग तौर पर होती है तभी तो मेरी दादी आवाज सुनकर ही बता दिया करती है कि यह गालियाँ नुनिया टोली से आ रही हैं और यह कलवार टोली से लेकिन मैं तो बस इतना ही समझता हूं कि यह बस गाली - गलौज है, चाहे देने वाला कोई भी हो या जिस गली का हो. बस वह डर बना रहा है सामनेवाले में ताकि उसकी धाक बनी रहे. यह बात एक दिन मैं फोन पर अपने दोस्त को बता रहा था कि मेरी दादी बोलने लगी कि ज्यादा पढ़ाई का यह रिजल्ट हैं कि तुम अब खानदानी परम्परा पर भी सवाल उठा रहे हो और जो गालियाँ देना शुरू की मेरी तो बोलती बंद हो गई क्योंकि मुद्दा खानदानी था इसलिए मैं चुपचाप बैठा हुआ सोचने लगा कि लोग गाली-गलौज को भी खानदानी परम्परा बना रहे हैं. इसीलिये तो बहुएं सुबह जल्दी उठकर चौका बर्तन पर भीड़ जाती हैं, वो भी घूँघट लटकाए और बिना खटर - पटर के सारा कुछ साफ. एक दिन पान के दुकान पर बैठा था कि एक काका आए और पांच-छह बार प्यार से पान मांगे लेकिन पान नहीं मिला फिर थोड़ी देर बाद जब खानदानी भाषा का प्रयोग किए तो जादू की तरह पान उनके मुंह में चला गया. मैं तो सोच में पड़ गया तभी पान वाला बोला लेखक महोदय ज्यादा मत सोचिए क्योंकि उनकी गाली के बिना मैं पान बना नहीं सकता हूं. अगर काका ऐसे गाली नहीं देते तो उनके ऊपर पानी फेंक दिया जाता ताकि पांच साल की परम्परा जारी रहे. अब आप बताइए कि गाली सुनकर मजा आता है कि नहीं?मैं बोला भईया गाली और मजा! फिर निकला चकमक सवाल के घेरे से. लेकिन मैं जैसे ही कुछ दूर आया तो पता चला कि मशहूर दादा का देहांत हो गया है तो फिर क्या, मैं चला उनके घर तो दादी का आलाप विलाप सुनकर हैरान रह गया कि कोई यह कह कर भी अंतिम विदाई देता है क्या ' अब मुझे कौन सुबह - सुबह गाली देगा, कैसे मैं काम करूंगी....'. जब मैंने यह बात अपने घर में बताई तो मेरी दादी तपाक से बोली ' साँप का बच्चा है तू, यही सब ना सुनने जाता है कुकुर कही के' लेकिन जैसे ही दादा जी उठे दादी की तो बोलती बंद क्योंकि खानदानी गाली का डर है. किसी की माँ - बहन करना सरल है ना अपनी बात मनवाने के लिए या सच बोलने वाले को चुप कराने के लिए लेकिन क्या करें यह तो जुबानी गाली खानदानी है जो कि अब सोशल मीडिया पर भी छा चुकी हैं और बोलने वाले तो अभी भी बोलेंगे ही कि साले ने क्या लिखा है,पुरा कुत्ते की तरह भौंकता है, तूने तो मार दी मेरी, पुरा दिया रे... परन्तु अब आप ही बताइए कि गाली अच्छी होती हैं या बुरी, सभ्य या अभद्र? गाली देना चाहिए या सुनना चाहिए? सब भूल गए ना गाली के गलियारों में, पता हैं फिर गाली दोगे खुद को बचाने के लिए या स्वयं को सही साबित करने के लिए ताकि खानदानी जुबान पर जंग़ ना लगे.

Tuesday, 3 January 2017

डॉक्टर के इंतजार में मरीज का अंतकाल (व्यंग्य )

डॉक्टर  के इंतजार में मरीज  का अंतकाल (व्यंग्य )-

प्राथमिक विद्यालय का वो टेंश का वाक्य मुझे आज भी याद है कि 'डाॅक्टर के आने से पहले मरीज मर चुका था ' और मैं भला भूल भी कैसे सकता हूँ ? क्योंकि आज तक डॉक्टरी के चक्कर मे मैने अपना आधा जीवन जो गुजार दिया है और दवाई के लिए तो कमाई का सारा धन । फिर भी बीमारी नक्सलवादीयो की तरह अपने ही घर मे बैठी हुई है । जाँच पर जाँच तो इतना हुआ है कि शरीर में खून से ज्यादा रसायनो की अधिकता हो गई है । जितनी मोटी - मोटी किताबे पढ़ कर डाॅक्टर की डिग्री हासिल की है ,उससे ज्यादा वजनदार तो मेरी फाइल हो गई है ।इस बात का एहसास मेरे दस साल के बच्चे ने कराई यह कह कर कि 'पापा आप डाॅक्टर की पढ़ाई करते है ' ।

मन ही मन सोचा कि जितना दवा पर खर्च किया है उससे डाॅक्टर की पढ़ाई भी हो जाती और क्लिनिक भी खुल गई होती पर छोङो , सोच कर क्या होगा? कुछ हो ना हो शरीर तो जांचघर बन गया ना। प्राइवेट के सुख इलाज का ए .सी . भी तन - मन को अब बेचैन करने लगा और आखिरकार सरकारी - अस्पताल का दरवाजा खटखटाना ही पङा लेकिन यहाँ की व्यवस्था को देखकर मरने की इच्छा जेनरिक दवाईयों की तरह 70% हो गई लेकिन जैसे ही मैने ए . सी. वाले डॉक्टर को खट - खट पंखे के नीचे देखा तो मेरा दिल एरिस्टो कम्पनी की दवा की भांति कोने मे खङा पर उम्मीद की साँस लेने लगा ।तब तक साहब का फोन बजा और वो एम्बुलेंस की तरह बाहर निकले और बोलते गए कि जिनको जीना है वो लोग मेरे प्राइवेट क्लीनिक पर आ जाए ।


अब हिम्मत नही थी और ना ही पाॅकेट था तो मैं भी उनकी कतार मे अपने फाइल को लेकर बैठ गया , कि शायद एक - दो साल बाद मेरा भी नम्बर आ जाए ।अब आप सरकारी डाॅक्टरो की तरह मुझे भी मरीज मत समझिएगा क्योंकि हम सब तो लाइन में लगकर के अपने जिन्दगी से बेलाइन हो चुके है । मरीजो को तो अखबार के बिस्तर पर लाइन के इंतजार मे माथे पर नम्बर लिखकर लिटाया गया है किसी कूङेदान और पानी टंकी कि आङ - छाँव तले ।
मरीजो की छोङो परिजनों का हाल तो बेहाल है और बचपन वाले टेंश का वाक्य अब गलत लगने लगा ।तब तक किसी कम्पाउंडर की तरह इक बात और जेहन में आ गई कि " डाॅक्टर के इंतजार मे मरीज मर चुका था " और साथ ही साथ सही भी लगने लगा बिल्कुल पौराणिक चिकित्सा की तरह ।योगा के युग मे तो बेड पर सोए थे इसलिए दवा से बेआसार हो कर दुआ पर भरोसा कर सब के सब "सर्वे सन्तु निरामया " का जाप करने में लग गए ।

Friday, 30 December 2016

इस साल नोटबंदी बना मज़ाक, आप भी जानिए पर जुत्ता मत मारिएगा प्लीज-

इस साल नोटबंदी बना मज़ाक, आप भी जानिए पर जुत्ता मत मारिएगा प्लीज -

साहब, नोटबंदी को लेकर के सब परेशान हैं, मैं भी परेशान क्योंकि मैं ना मोदी, ना राहुल, ना रविश और ना ही खान हूँ. लेकिन पूरी नोटबंदी के मसले में कुछ लोगों ने मजाकिया मशाल भर दिया हैं ताकि यह दर्द कुछ कम हो हो. कल की एक खबर ने बताया की एक लडके ने ख़ुदकुशी कर ली क्योंकि उसको उसकी डार्लिंग ने जिओ से मिस्ड कॉल मार दिया था तो मेरे दिमाग की खुरपाती में एक खबर झाय से आई की चलों भाई अच्छा हुआ की किसी लड़की ने खुल्ले के चक्कर में अपने बॉयफ्रेंड को नहीं नोचा पर मेरे एक मित्रा ने बताया की जब उसकी डार्लिंग के पर्स में खुल्ला पैसा नहीं निकला तो उसने अपनी डार्लिंग का पर्स फेक दिया और बोला चल बे कैश लेस, कॅशलेस हो जाते हैं. कितने लोग कैशलेस हो गए हैं अबतक, मैं तो कहता हूँ की सब कैशलेस हो गए हैं क्योंकि हमारे पास तो कभी कॅश था ही नहीं जो था उसका तो ऐश कर लेते हैं और जिनके पास कॅश था उनपर मोदीजी का ताला लटका हैं तो हुए ना सब कैशलेस. सर मत खुजलाये की मजा नहीं आ रहा है, मजा आएगा फ़िक्र ना कर यारे मजा तो बहुत आएगा, इतना मजा आएगा की तू मजा का मतलब भूल जायेगा और गूगल पर ढूंढेगा जैसे अभी पैसा ढूंढ रहा है. लेकिन पक्का बोल रहा हूँ की मजा आएगा बिलकुल कटरीना की माज़ा की तरह, पक्के हुए आम की तरह, जलेबी की रस की तरह और सनी लियोनी की फिल्म की तरह मजा आएगा पर पहले बैंक में कालाधन तो आने दे यारे तभी तो मजा आएगा जलेबी का, रसगुल्ला का, सनी के लेओनी का सब मजा आएगा काहे की बिना पैसा का तो सुलभ शौचालय वाले खड़ा हो कर निकलने नहीं देते तो फिर बिना पैसा का मजा, क्या  ख़ाक आएगा . 50 दिन तो इन्तेजार कर लिया ना थोड़ा इन्तेजार का और मजा लीजिये ना, फ्री में मिल रहा है. मुझे पता हैं अब आप मुझे जूता मरोगे क्योंकि मैं मोदी जी का सपोर्टर समझ कर. पर आपका जूता पुराना हो गया है और पैसे नहीं है तो जूता फट जायेगा इसलिए फेक कर ना मारे, काहे की फट जाने के बाद मोची भी नहीं सिलेगा काहे की,  भाई छुट्टा नहीं तो फिर नंगे पैर घूमोगे का ? 

Wednesday, 28 December 2016

लंगोट का ढीलापन बीवी जानकर छुपा लेती हैं पर अपने अंडरमन की नपुंसकता बाजार में काहे बेच रहे हो!

हाँ, मेरी नज़र ब्रा के स्ट्रैप पर जा के अटक जाती है, जब ब्रा और पैंटी को टंगा हुआ देखता हूँ तो मेरे आँखों में भी नशा सा छा जाता हैं. जो बची-खुची फीलिंग्स रहती हैं उनको मेरे दोस्त बोल- बोल कर के जगा देते हैं. और कौन नहीं देखता है, जब सामने कोई भी चीज आ जाये तो हम देखते हैं. हाँ, यह अलग बात हैं की कोई बताता हैं और कोई छुपाता हैं और कोई बाजार में लुटाता हैं उन कपड़ों का मजाक. पर देखना गलत नहीं है, खुद के अंदर आपको क्या महसूस होता है यह भी नेचुरल है. रस्ते पर चलते-चलते सामने जब टट्टी या गोबर या पॉलिथीन में फेका गया खाना दिख जाता हैं तो मन में भी वैसे ही घिन्न उठती हैं, चाहे आप घर से पूजा-पाठ और खीर-मलाई काहे ना खा क्र निकले हो. लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं हैं की अब हम रस्ते वाली घिन्न की बात बता कर के ऑफिस और घर में बैठे दोस्तों के अंदर भी वैसा घृणा भर दे. नज़ारे बेशर्म नहीं होती वह तो एक कैमरा की तरह हैं, जो फ्रेम में आएगा कैप्चर तो होगा ही पर मन की मर्यादा को सेंसर बोर्ड बनाकर उस सीन को काट भी सकते हैं, काटना चाहे तो, अगर बेमतलब बात का मज़ा ना लेना हो तो! महिलाओं के पहनावा और चाल-चलन पर सवाल तो उठाते हैं पर उन मजदूर महिलाओं के फटे ब्लाउज़ को ढकने की बात कोई क्यों नहीं कर रहा हैं. उनकी पूरी ज़िन्दगी तो पेटीकोट और फटी साड़ी में कट जाता है. और हम हैं की पोर्न और ब्रा -पैंटी पर अटके पड़े हैं. अरे मेरी गर्लफ्रेंड या हमदोनों अपनी मर्जी से सेक्स करते हैं पर उसको मैं MMS नहीं बनाता, ना  ही दोस्तों के बीच उस सेक्स की कहानी सुनाता हूँ. क्यूंकि मेरा दिल तो यही कहता हैं की हम दोनों अपनी मर्जी से सेक्स करते हैं, हां मैं ब्रा-पैंटी भी देखता हूँ पर उन बातों को सामाजिक स्तर पर उछालता क्योंकि उनके सम्मान के साथ मैं अपनी मान - मर्यादा का भी ख्याल रखता हूँ. हर इंसान तो अपने कपडे के अंदर नंगा होता है पर इसका मतलब यह नहीं होता हैं हम नंगे घूमे, बोलो आजादी हैं, सोंचो जो जी करता हैं पर अपने मनमर्जियां को किसी और पर थोपो नहीं और ना ही उसको बाजार में नंगा करो. उसको तो नंगा कर रहे हो पर अपनी गिरी हुयी नज़र से खुद को तो बचा लो क्योंकि उसी में से कोई ऐसा भी दोस्त होता हैं जो तुझे कहता है की ' साला! पूरा कुत्ता हैं, हांड़ी में मुँह भी मराता हैं और बाजार में खुद को निलाम भी करता है'. लंगोट का ढीलापन बीवी जानकर छुपा लेती हैं पर अपने अंडरमन  की नपुंसकता बाजार में काहे बेच रहे हो! मुद्दा और भी हैं बहस के लिए यार, महिलाओं को आज़ाद जीने दो.

Thursday, 22 December 2016

जानवरों के प्रति जागरूक हैं, तो फिर इंसानों से इतनी बेरुखी क्यों है, साहेब?-

जानवरों के प्रति जागरूक हैं, तो फिर इंसानों से इतनी बेरुखी क्यों है, साहेब?-


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किसी के दुख में शामिल होने से उसका दर्द दूर नहीं होता है. किसी के अर्थी को कंधा देने से उसके परिवार की कमी दूर नहीं होता है पर हां, विकट घड़ी में किसी को भी सहारा देना चाहिए. इससे हमारे व्यक्तित्व का परिचय होता है. ओड़िशा के कालाहांडी जिला के दानामांझी को अपने पत्नी का लाश 60 किमी तक कंधों पर ढोना पड़ा, उसी राज्य के संबलपुर निवासी चंद्रमणी को भी किसी ने साहारा नहीं दिया तो लकड़ी के अभाव में कंधे पर ले जाकर दफन कर दिया और इसी राज्य के नयागढ की एक मजदूर महिला को अपने पति के लाश को नागपुर के किसी ट्रेन में छोड़कर मजबूरन आना पड़ा. ऐसी ओर भी बहुत-सी घटनाएं है उदाहरण के लिए पर अब तो इंसान ही उदाहरण का पात्र बन गया है घटना-दुर्घटना का. लेकिन जब यह मामले सबके सामने आते है तो भारत-पाक की तरह बातूनी युध्द शुरू हो जाता है, आज के मीडिया-जगत में. सोशल नेटवर्क और मीडिया खबरों ने तो मानव संवेदना पर सवाल उठाना शुरू कर देते हैं. तरह-तरह की बात-सवालात जैसे कि, इंसानियत मर गई है, लोगों के आंख में अब दयाभाव नहीं हैं आदि-इत्यादि. मैंने भी यह सवाल किए पर आज जब कुछ बातों पर गौर किया तो लगा कि ना दयाभाव मरा है और ना ही इंसानियत खत्म हुई है. यह बात मैं किसी का पक्षधर होकर नहीं कर रहा पर जब मैंने देखा कि हम किसी गाय के लिए रोटी का जुगाड़ कर देते है, गाय के लिए आंदोलन भी करते है तो फिर हमारा दयाभाव मरा कहां है. हां, पर किसी गरीब लाचार को रोटी देने से साफ मना कर देते हैं. गुटखा, सिगरेट के लिए तो खुल्ला करा लेते है, पर किसी अनाथ-बेसहारा को देना हो तो पॉकेट में बस ऐसे ही टटोलकर बोलते है कि यार छुट्टा नहीं है. और अभी तो हम नोटबंदी का सहारा लेने लगे है. पर वहीं पर गुमटी से एक बिस्कुट खरीदकर कुत्तों को शौक से खिलाते है, तो क्या यह इंसानियत नहीं है. कुत्तों को गोद में लेने से हिचकिचाते नहीं और अनाथ से दरकिनार होकर निकल लेते है. पर ऐसा भी नहीं है कि हम इंसानों से प्यार नहीं करते लेकिन उसका जगह बदल जाता है. देखिए कहां पर, जब कुत्ते गली में टॉयलेट करते हैं तो हम बस नजर हटाकर चल देते है या मार कर भगाते हैं, क्योकिं उनको देखने से आंख में घाव निकलता है ऐसा लोगों का मानना है. लेकिन रवैया हम इंसानों के साथ करते तो कितना अच्छा होता की कोई खुले में शौच नहीं करता, सरकार के करोड़ो बच जाते. पर हम तो जब खुले में शौच करने निकलते है तो ‘मानवीय मल महक’ को सुंघते हुए उस प्रक्रीया में लग जाते है. सब गंदगी, ऊंच-नीच भूलकर शांति से दम निकालते है. कुत्ता-बिल्ली के रोने पर हम उनको मारते है यानि की एक प्रकार से चुप कराते है ताकि अशुभ घटना ना घटे पर पड़ोस में कोई रो रहा हो तो कान में हेडफोन डालकर सो जाते है. बिल्ली-सियार रास्ता काट दे तो थोड़ा रूकर निकलते है चाहे जितनी भी जल्दी क्यों ना हो, भले ही इसके पीछे अंधविश्वास की कहानी है पर सच तो यह है कि हमारी सुरक्षा के लिए ही है क्योकिं जानवर जब भी भागते है तो झुंड में या फिर उनके पीछे अन्य जानवर भी हो सकता है, तो रूक जाने का प्रथा प्रचलित हो गया ताकि एक्सीडेंट ना हो. पर कोई बुजुर्ग रास्ता पार करते वक्त बिच में आ गया तो बोलते है कि अबे मेरे ही गाड़ी से मरना है क्या कई बार तो धक्का मारकर चल भी देते हैं. हम इन जानवरों के लिए रूक सकते है तो फिर इंसान के लिए क्यूं नहीं रूक सकते. किसी को सड़क पार नहीं करा सकते पर किसी सड़क के पार जाने वाले को धक्का तो नहीं मारना चाहिए. किसी गिरे हुए को मत उठाओ पर पर उसकी नजर में तो मत गिरो. बेशक जानवरों से प्यार करो पर इंसान से तो दूरी मत बनाओ. किसी के अर्थी पर पैसा मत लूटाओ पर कंधा तो लगा दो. एक तरफ तो जानवरों से प्यार कर के हम अपनी इंसानियत को दिखा रहे हैं पर इंसान होकर इंसान से ही नजर छुपा रहे हैं. जानवरो के प्रति जागरूक होना हमारी मानवता का परिचय दे रहा है पर दुसरी ओर लाचार-बेसहारा लोगों को दरकिनार करना इंसानियत पर नहीं बल्कि हमारे मानसिकता पर प्रश्न उठा रहा है. अगर ऐसी मानसिकता बनी रही तो फिर एकदिन इन जानवरों से प्यार करने वाला इंसान ही मर जाएगा. ‘एक फूल गुलजार नहीं करता है चमन को/पर एक भौंरा बदनाम कर देता है चमन को’.