Wednesday, 14 October 2015

माँस पर मँडराते राजनीतिकबाज़

माँस पर मँडराते राजनीतिकबाज़ 

" मदीरा में डूब रही हैं मानवता 
और राम - रहीम के नाव को लगे हैं हम बचाने में "
कभी धर्म तो कभी माँस  के टुकड़ों के आधार पर लड़ता - झगड़ता हमारा बुद्धजीवी समाज। कभी चाय पर चर्चा करते हैं तो कभी चाउमीन को अपराध का कारण बताते हैं और अभी माँस पर बहस जारी हैं। ऐसा लग रहा हैं की अब कोई ठोस मुद्दा नहीं हैं हमारे पास चर्चा करने के लिए। मुद्दा बहुत हैं लेकिन गरीबी व जनसमस्याओं पर बात कर के मिलेगा क्या ,तभी तो हमारे नेतृत्वकर्ता धर्मगत व जातिगत मुद्दों पर बयान दिए जा रहे हैं। हम क्या खाएंगे और क्या नहीं खाएंगे इसका फैसला तो घर का मालिक भी नहीं हैं तो फिर किसी एक व्यक्ति के कह देने से हम मांस खाना छोड़ नहीं सकते हैं परन्तु कुछ नेताओं के बहस से ऐसा प्रतीत हो रहा हैं की अब हमे सांस लेने के लिए भी उनकी अनुमति लेनी होगी। ठीक हैं जनता माँस खाना छोड़ देगी लेकिन माँस में केवल गौ - माँस तो नहीं  आता हैं ना तो फिर जब बात बीफ की हो रही हैं तो हम भैंस,बैल इत्यादि के ऊपर बहस क्यों नहीं कर रहे हैं। चाहे बात आजतक ,इंडिया टीवी ,न्यूज़ नेशन या किसी भी इलेक्ट्रॉनिक्स मीडिया की करे तो यह देखने को मिला की एंकर बहस को बीफ पर शुरुआत करते हैं और पेनलिस्ट उसको गौहत्या या गौमांस पर लाकर ख़त्म कर देते हैं बिलकुल वैसे ही जैसे की बीफ ना खाने को लेकर के जोर डाला जा रहा हैं। हिन्दू धर्म में गाय को माँ   की प्रधानता दी गई हैं परन्तु उस वक़्त आस्था - भक्ति कहाँ चली जाती हैं जब बूढी - बाँझ गाय को सड़क पर छोड़ दिया जाता हैं और वो किसी ना  किसी हादसे का शिकार हो जाती हैं और उसकी दुर्गति को देख कर हम नाक बंद कर के भाग जाते हैं। इससे तो यह साफ़ ज़ाहिर हो रह हैं की कहीं न कहीं हमारा स्वार्थ भर तक का ही रिश्ता हैं और इतना ही नहीं जहाँ पर बीफ पर प्रतिबंध लगाया हैं वहां पर भी कुछ न कुछ फायदा देख कर ही  लगाया  गया हैं। अब तो यह भी बोला जा रहा हैं की सड़को पर भटकती गायों के लिए गौशाला बनाया जायेगा लेकिन यहाँ तो इंसानो के लिए भी पर्याप्त ना घर  ना ही आश्रम तो फिर जानवरों को कौन पूछता हैं।  अगर भरोसा नहीं हैं तो इंदिरा आवास योजना को देख  लीजिये हकीकत पता चल जायेगा। चाहे हिन्दू हो या मुस्लिम समुदाय भले ही जीवों के प्रति प्यार - श्रद्धा दिखा रहे हैं लेकिन वास्तविकता तो यही हैं की यही लोग इन जानवरों की बलि चढाने में भी नहीं पीछे हैं। मूलरूप से धर्म का मतलब हैं मानवता का रक्षा करना और अहिंसा का पालन करना लेकिन यहाँ तो धर्म का उपयोग किया जा रहा हैं मानवता को मिटाने के लिए क्यूंकि हरसाल जाने कितने मासूम लोग धर्म के दंगो में मर जाते हैं। अर्थव्यवस्था  की दृष्टि से देखा जाये तो भारत बीफ व्यापार में दूसरे स्थान पर हैं और यदि रोजमर्रा के जीवन पर भी गौर किया जाये तो  माँस के वजह से ही लगभग बहुत सरे लोगो का घर - गृहस्ती चलता हैं। बीफ बैन  यदि होता हैं तो यह हमारे लिए घाटे का सौदा होगा, सामाजिक स्तर से और अर्थव्यवस्था के स्तर से भी।
                            प्राकृतिक संतुलन बांये रखने के लिए आहार - श्रृंखला  वैज्ञानिक आधार से सही हैं और आज से नहीं जब से मानव सभ्यता हैं इंसान अपनी भूख मिटाने के लिए कुछ ना कुछ कहते आ रहा हैं और आज के दौर में बस इतना फर्क आया हैं की हम उन चीजो को नाम देकर चटपटा बना कर खाने लगे हैं। इस नाम के चक्कर में ही हम खुद को घनचक्कर में डाल रखे हैं।  बीफ को  बस माँस मात्र तक ही छोड़ दिया जाये तो फिर हमारे धर्मनिरपेक्ष दिवार को गिरने का खतरा नहीं होगा। लेकिन जिस तरह से हम लोकतंत्र के संविधान  को भूल कर के खुद के स्वार्थ के लिए लड़ - झगड़ रहे हैं तो कहीं ऐसा न हो की  फिर कोई धर्म ही ना बचे धरा पर। संविधान ने सबको समानता का अधिकार दिया हैं तो फिर हम किसी एक धर्म की आस्था को बरकरार रखने के लिए दूसरे धर्म की रोजी - रोटी तो नहीं छीन सकते हैं ,इसका अधिकार ना धर्म देता हैं और ना ही भारत का संविधान। बीफ खाने वालों में हिन्दू भी शामिल हैं और इसके व्यापार में भी ,तो क्या वे हिन्दू नहीं हैं। बीफ किसी भी बिरादरी का नहीं हैं और ना ही होगा , जिन लोगो ने इसको अपना कृषि व्यापार बना रखा हैं उनके लिए तो यही आस्था हैं और यही धर्म। बीफ पर प्रतिबन्ध लगाना हैं तो फिर हमें सिर्फ गाय के बारे में नहीं बल्कि अन्य  जानवरों के बारे में भी सोंचना चाहिए।
                         बीफ पर बवाल करने से अच्छा होगा की इसके व्यापार को और भी बढ़ाया जाये ताकि हम दूसरे स्थान से ,पहले स्थान पर आ जाये  क्यूँकि  धर्म और आस्था के साथ जोड़ कर चर्चा करना यह हमारे लिए घातक बनाते जा रहा हैं। माँस के टुकड़ों के लिए लोकतंत्र को खंडित करना , ना हिन्दू के पक्ष में हैं और ना ही मुस्लिम के। राष्ट्र और धर्म के लिए चिंता जताने वालों को प्रतिबन्ध लगाना हैं तो शराब , गुटखा , सिगरेट पर लगाये ताकि एक स्वस्थय समाज का गठन हो क्यूंकि मांस खाना  सेहत के लिए बुरा नहीं हैं तो फिर इस पर हो - हल्ला क्यों  ? संविधान ने बुचरखानों को आबादी से दूर बनाने को आदेश दे रखा हैं ताकि धर्म की आस्था को ठेस ना पहुंचे।  लेकिन जरुरत हैं सिर्फ इतनी की संविधान की सुंदरता को बरक़रार रखा जाये और मांस के ऊपर चील -कौवों  को ही मँडराने दिया जाये। हम तो इंसान हैं और हम ईद में गले मिलते हैं और दिवाली का दीप भी साथ मिलकर जलाते हैं क्यूंकि हमें तो बस खुशियों में एक - दूजे के साथ झूमने की आदत हैं। अब बीफ पर बवाल बंद करो और समाज गठन के लिए कुछ तो सवाल करो ताकि रोटी बंटे, इंसान की बोटी नहीं। 

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