Friday, 30 December 2016

इस साल नोटबंदी बना मज़ाक, आप भी जानिए पर जुत्ता मत मारिएगा प्लीज-

इस साल नोटबंदी बना मज़ाक, आप भी जानिए पर जुत्ता मत मारिएगा प्लीज -

साहब, नोटबंदी को लेकर के सब परेशान हैं, मैं भी परेशान क्योंकि मैं ना मोदी, ना राहुल, ना रविश और ना ही खान हूँ. लेकिन पूरी नोटबंदी के मसले में कुछ लोगों ने मजाकिया मशाल भर दिया हैं ताकि यह दर्द कुछ कम हो हो. कल की एक खबर ने बताया की एक लडके ने ख़ुदकुशी कर ली क्योंकि उसको उसकी डार्लिंग ने जिओ से मिस्ड कॉल मार दिया था तो मेरे दिमाग की खुरपाती में एक खबर झाय से आई की चलों भाई अच्छा हुआ की किसी लड़की ने खुल्ले के चक्कर में अपने बॉयफ्रेंड को नहीं नोचा पर मेरे एक मित्रा ने बताया की जब उसकी डार्लिंग के पर्स में खुल्ला पैसा नहीं निकला तो उसने अपनी डार्लिंग का पर्स फेक दिया और बोला चल बे कैश लेस, कॅशलेस हो जाते हैं. कितने लोग कैशलेस हो गए हैं अबतक, मैं तो कहता हूँ की सब कैशलेस हो गए हैं क्योंकि हमारे पास तो कभी कॅश था ही नहीं जो था उसका तो ऐश कर लेते हैं और जिनके पास कॅश था उनपर मोदीजी का ताला लटका हैं तो हुए ना सब कैशलेस. सर मत खुजलाये की मजा नहीं आ रहा है, मजा आएगा फ़िक्र ना कर यारे मजा तो बहुत आएगा, इतना मजा आएगा की तू मजा का मतलब भूल जायेगा और गूगल पर ढूंढेगा जैसे अभी पैसा ढूंढ रहा है. लेकिन पक्का बोल रहा हूँ की मजा आएगा बिलकुल कटरीना की माज़ा की तरह, पक्के हुए आम की तरह, जलेबी की रस की तरह और सनी लियोनी की फिल्म की तरह मजा आएगा पर पहले बैंक में कालाधन तो आने दे यारे तभी तो मजा आएगा जलेबी का, रसगुल्ला का, सनी के लेओनी का सब मजा आएगा काहे की बिना पैसा का तो सुलभ शौचालय वाले खड़ा हो कर निकलने नहीं देते तो फिर बिना पैसा का मजा, क्या  ख़ाक आएगा . 50 दिन तो इन्तेजार कर लिया ना थोड़ा इन्तेजार का और मजा लीजिये ना, फ्री में मिल रहा है. मुझे पता हैं अब आप मुझे जूता मरोगे क्योंकि मैं मोदी जी का सपोर्टर समझ कर. पर आपका जूता पुराना हो गया है और पैसे नहीं है तो जूता फट जायेगा इसलिए फेक कर ना मारे, काहे की फट जाने के बाद मोची भी नहीं सिलेगा काहे की,  भाई छुट्टा नहीं तो फिर नंगे पैर घूमोगे का ? 

Wednesday, 28 December 2016

लंगोट का ढीलापन बीवी जानकर छुपा लेती हैं पर अपने अंडरमन की नपुंसकता बाजार में काहे बेच रहे हो!

हाँ, मेरी नज़र ब्रा के स्ट्रैप पर जा के अटक जाती है, जब ब्रा और पैंटी को टंगा हुआ देखता हूँ तो मेरे आँखों में भी नशा सा छा जाता हैं. जो बची-खुची फीलिंग्स रहती हैं उनको मेरे दोस्त बोल- बोल कर के जगा देते हैं. और कौन नहीं देखता है, जब सामने कोई भी चीज आ जाये तो हम देखते हैं. हाँ, यह अलग बात हैं की कोई बताता हैं और कोई छुपाता हैं और कोई बाजार में लुटाता हैं उन कपड़ों का मजाक. पर देखना गलत नहीं है, खुद के अंदर आपको क्या महसूस होता है यह भी नेचुरल है. रस्ते पर चलते-चलते सामने जब टट्टी या गोबर या पॉलिथीन में फेका गया खाना दिख जाता हैं तो मन में भी वैसे ही घिन्न उठती हैं, चाहे आप घर से पूजा-पाठ और खीर-मलाई काहे ना खा क्र निकले हो. लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं हैं की अब हम रस्ते वाली घिन्न की बात बता कर के ऑफिस और घर में बैठे दोस्तों के अंदर भी वैसा घृणा भर दे. नज़ारे बेशर्म नहीं होती वह तो एक कैमरा की तरह हैं, जो फ्रेम में आएगा कैप्चर तो होगा ही पर मन की मर्यादा को सेंसर बोर्ड बनाकर उस सीन को काट भी सकते हैं, काटना चाहे तो, अगर बेमतलब बात का मज़ा ना लेना हो तो! महिलाओं के पहनावा और चाल-चलन पर सवाल तो उठाते हैं पर उन मजदूर महिलाओं के फटे ब्लाउज़ को ढकने की बात कोई क्यों नहीं कर रहा हैं. उनकी पूरी ज़िन्दगी तो पेटीकोट और फटी साड़ी में कट जाता है. और हम हैं की पोर्न और ब्रा -पैंटी पर अटके पड़े हैं. अरे मेरी गर्लफ्रेंड या हमदोनों अपनी मर्जी से सेक्स करते हैं पर उसको मैं MMS नहीं बनाता, ना  ही दोस्तों के बीच उस सेक्स की कहानी सुनाता हूँ. क्यूंकि मेरा दिल तो यही कहता हैं की हम दोनों अपनी मर्जी से सेक्स करते हैं, हां मैं ब्रा-पैंटी भी देखता हूँ पर उन बातों को सामाजिक स्तर पर उछालता क्योंकि उनके सम्मान के साथ मैं अपनी मान - मर्यादा का भी ख्याल रखता हूँ. हर इंसान तो अपने कपडे के अंदर नंगा होता है पर इसका मतलब यह नहीं होता हैं हम नंगे घूमे, बोलो आजादी हैं, सोंचो जो जी करता हैं पर अपने मनमर्जियां को किसी और पर थोपो नहीं और ना ही उसको बाजार में नंगा करो. उसको तो नंगा कर रहे हो पर अपनी गिरी हुयी नज़र से खुद को तो बचा लो क्योंकि उसी में से कोई ऐसा भी दोस्त होता हैं जो तुझे कहता है की ' साला! पूरा कुत्ता हैं, हांड़ी में मुँह भी मराता हैं और बाजार में खुद को निलाम भी करता है'. लंगोट का ढीलापन बीवी जानकर छुपा लेती हैं पर अपने अंडरमन  की नपुंसकता बाजार में काहे बेच रहे हो! मुद्दा और भी हैं बहस के लिए यार, महिलाओं को आज़ाद जीने दो.

Thursday, 22 December 2016

जानवरों के प्रति जागरूक हैं, तो फिर इंसानों से इतनी बेरुखी क्यों है, साहेब?-

जानवरों के प्रति जागरूक हैं, तो फिर इंसानों से इतनी बेरुखी क्यों है, साहेब?-


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किसी के दुख में शामिल होने से उसका दर्द दूर नहीं होता है. किसी के अर्थी को कंधा देने से उसके परिवार की कमी दूर नहीं होता है पर हां, विकट घड़ी में किसी को भी सहारा देना चाहिए. इससे हमारे व्यक्तित्व का परिचय होता है. ओड़िशा के कालाहांडी जिला के दानामांझी को अपने पत्नी का लाश 60 किमी तक कंधों पर ढोना पड़ा, उसी राज्य के संबलपुर निवासी चंद्रमणी को भी किसी ने साहारा नहीं दिया तो लकड़ी के अभाव में कंधे पर ले जाकर दफन कर दिया और इसी राज्य के नयागढ की एक मजदूर महिला को अपने पति के लाश को नागपुर के किसी ट्रेन में छोड़कर मजबूरन आना पड़ा. ऐसी ओर भी बहुत-सी घटनाएं है उदाहरण के लिए पर अब तो इंसान ही उदाहरण का पात्र बन गया है घटना-दुर्घटना का. लेकिन जब यह मामले सबके सामने आते है तो भारत-पाक की तरह बातूनी युध्द शुरू हो जाता है, आज के मीडिया-जगत में. सोशल नेटवर्क और मीडिया खबरों ने तो मानव संवेदना पर सवाल उठाना शुरू कर देते हैं. तरह-तरह की बात-सवालात जैसे कि, इंसानियत मर गई है, लोगों के आंख में अब दयाभाव नहीं हैं आदि-इत्यादि. मैंने भी यह सवाल किए पर आज जब कुछ बातों पर गौर किया तो लगा कि ना दयाभाव मरा है और ना ही इंसानियत खत्म हुई है. यह बात मैं किसी का पक्षधर होकर नहीं कर रहा पर जब मैंने देखा कि हम किसी गाय के लिए रोटी का जुगाड़ कर देते है, गाय के लिए आंदोलन भी करते है तो फिर हमारा दयाभाव मरा कहां है. हां, पर किसी गरीब लाचार को रोटी देने से साफ मना कर देते हैं. गुटखा, सिगरेट के लिए तो खुल्ला करा लेते है, पर किसी अनाथ-बेसहारा को देना हो तो पॉकेट में बस ऐसे ही टटोलकर बोलते है कि यार छुट्टा नहीं है. और अभी तो हम नोटबंदी का सहारा लेने लगे है. पर वहीं पर गुमटी से एक बिस्कुट खरीदकर कुत्तों को शौक से खिलाते है, तो क्या यह इंसानियत नहीं है. कुत्तों को गोद में लेने से हिचकिचाते नहीं और अनाथ से दरकिनार होकर निकल लेते है. पर ऐसा भी नहीं है कि हम इंसानों से प्यार नहीं करते लेकिन उसका जगह बदल जाता है. देखिए कहां पर, जब कुत्ते गली में टॉयलेट करते हैं तो हम बस नजर हटाकर चल देते है या मार कर भगाते हैं, क्योकिं उनको देखने से आंख में घाव निकलता है ऐसा लोगों का मानना है. लेकिन रवैया हम इंसानों के साथ करते तो कितना अच्छा होता की कोई खुले में शौच नहीं करता, सरकार के करोड़ो बच जाते. पर हम तो जब खुले में शौच करने निकलते है तो ‘मानवीय मल महक’ को सुंघते हुए उस प्रक्रीया में लग जाते है. सब गंदगी, ऊंच-नीच भूलकर शांति से दम निकालते है. कुत्ता-बिल्ली के रोने पर हम उनको मारते है यानि की एक प्रकार से चुप कराते है ताकि अशुभ घटना ना घटे पर पड़ोस में कोई रो रहा हो तो कान में हेडफोन डालकर सो जाते है. बिल्ली-सियार रास्ता काट दे तो थोड़ा रूकर निकलते है चाहे जितनी भी जल्दी क्यों ना हो, भले ही इसके पीछे अंधविश्वास की कहानी है पर सच तो यह है कि हमारी सुरक्षा के लिए ही है क्योकिं जानवर जब भी भागते है तो झुंड में या फिर उनके पीछे अन्य जानवर भी हो सकता है, तो रूक जाने का प्रथा प्रचलित हो गया ताकि एक्सीडेंट ना हो. पर कोई बुजुर्ग रास्ता पार करते वक्त बिच में आ गया तो बोलते है कि अबे मेरे ही गाड़ी से मरना है क्या कई बार तो धक्का मारकर चल भी देते हैं. हम इन जानवरों के लिए रूक सकते है तो फिर इंसान के लिए क्यूं नहीं रूक सकते. किसी को सड़क पार नहीं करा सकते पर किसी सड़क के पार जाने वाले को धक्का तो नहीं मारना चाहिए. किसी गिरे हुए को मत उठाओ पर पर उसकी नजर में तो मत गिरो. बेशक जानवरों से प्यार करो पर इंसान से तो दूरी मत बनाओ. किसी के अर्थी पर पैसा मत लूटाओ पर कंधा तो लगा दो. एक तरफ तो जानवरों से प्यार कर के हम अपनी इंसानियत को दिखा रहे हैं पर इंसान होकर इंसान से ही नजर छुपा रहे हैं. जानवरो के प्रति जागरूक होना हमारी मानवता का परिचय दे रहा है पर दुसरी ओर लाचार-बेसहारा लोगों को दरकिनार करना इंसानियत पर नहीं बल्कि हमारे मानसिकता पर प्रश्न उठा रहा है. अगर ऐसी मानसिकता बनी रही तो फिर एकदिन इन जानवरों से प्यार करने वाला इंसान ही मर जाएगा. ‘एक फूल गुलजार नहीं करता है चमन को/पर एक भौंरा बदनाम कर देता है चमन को’. 

Monday, 19 December 2016

एक और दानामांझी: सिंदूर तो दिया,अर्थी न दे पाया चंद्रमणी-


चंद्रमणी जोर और उसके बेटे लाश को बिन अर्थी श्मशान घाट ले जाते हुए।  पिक - नवभारत 

एक और दानामांझी: सिंदूर तो दिया,अर्थी न दे पाया चंद्रमणी-


‘गरीब को नहीं मिलता/डोली को कंधा/अर्थी कौन उठाता है/जहां मिलता नहीं फायदा/वहां पर मुंह भी नहीं खुलता है/सिंदूर की किमत कम ना होती/तो यह भी नसीब ना होता…’ दाना मांझी के दर्द की कहानी को अभे कोई भूला नहीं कि इस समाज ने एक और दीना को पत्नी की लाश ढोने को मजबूर कर दिया. यह कहानी बरगढ़ जिला में गुजारा कर रहे चंद्रमणी जोर की है, जो कि अपनी पत्नी के लिए अर्थी ना बना पाया तो कंधों पर ही लाश को शमशान घाट तक लाश बनकर ढोया. ना लकड़ी नसीब हो पाया और ना ही आग पर दो गज जमीन में दफना कर बीवी को अंतिम विदाई दे दिया. फूटकर रो भी ना पाया, अगर रोता तो फिर अंतिम संस्कार कौन करता. कौन पोंछता उसके आंसूओं को, कौन रोकता उसके दर्द के दरिया को? यह समाज, जिसने ना कंधा दिया, ना लकड़ी तो क्या ये उसके आंसुओं को पोंछते. शायद यह सब सोंचकर काठ बन गया था कलेजा उसका. वैसे इस समाज ने उसे कठ-करेज तो कहा ही होगा, पर कठ-करेज कौन है? बरगढ जिला, भेड़ेन ब्लॉक के उदेपुर गांव के लोग कठ-करेज ना होते तो कम से कम एक बांस तो अर्थी के लिए दे दिए होते. अरे, सौ-पचास ना सही बस कोई एक आकर भी तो कंधा दे दिया होता तो शायद आज फिर से ओड़िशा की इस धार्मिक धरती को यह दानवता का घूंट नहीं पीना पड़ता. अच्छा हुआ कि चंद्रमणी के चार कंधे पहले से तैयार हैं. अच्छा हुआ कि ऐसे समय पर उसके तीन बेटे साथ दिए. हालाकि चंद्रमणी जोर जयघंट गांव, संबलपुर जिला का मूल निवासी है पर वह अपने परिवार का गुजारा कराने के लिए उदेपुर में सारमंगला पूजा करने गया था. इस पूजा से मिले दान-दक्षिणा से गुजारा होता है. इसके गरीबी ने यह पहली दफा दर्द नहीं दिया है, इससे पहले बीमार दो बेटी को भी ना बचा पाया और पत्नी हेमबती को भी बीमार ही मरने दिया. क्या करता यह गरीब क्योंकि ओड़िशा के स्वास्थ्य विभाग और आर्थिक स्थिति के बारे में तो हम जानते ही है. इतना ही नहीं यह गुजारा भी कर रहा है तो पेड़ के नीचे. वाह रे हमारा समाज हमें तो कंबल ब्रांडेड चाहिए, घर डेकोरेटेड चाहिए पर हम उनको क्यों नहीं कुछ देते जिनके पास कुछ हैं ही नही. लेकिन चंद्रभूषण ने साबित कर दिया की अब दुनिया मांझी-चमार-दुषाद से नहीं बल्कि गरीबी के दाग से नफरत करने लगी है. वरना इस घर-घर के पुजारी से क्या घृणा थी जो कि एक कंधा और एक बांस तक ना दे सका हमारा यह सामाज. इसी बात को सोंचकर चंद्रमणी भी कठ-करेज बन गया कि अपनी जीवनी संगिनी के अंतिम विदाई पर ना अर्थी दे पाया और ना आग. पर समाज का यह रूप देखकर आग उसके मन में तो जल ही रहा हैं. एक दिन उसे भी तो इसी आग में जल जाना है क्योंकि वह कोई नेता,एक्टर,मुखिया,सरपंच थोड़े ही है जो कि उसको कफन और अर्थी नसीब होगा.

Sunday, 18 December 2016

कैशलेश होने में नुकसान क्या है!


कैशलेश होने में नुकसान क्या है!

भले ही किसी टीवी डीबेट का मुद्दा ‘नेशन वांट्स नोट’ हो पर खबर तो यह है कि अब जेब में पैसा ढ़ोने की कोई जरूरत नहीं है, पॉकेटमारों की छुट्टी. भारत अब कैशलेश हो कर भी धनी बनेगा, सोने की चिड़िया बनने की तैयारी. अब ऑनलाइन पेमेंट करना है, घपलाबाजी खत्म. सरकार से लेकर मीडिया बाजार तक सब के सब यही रट लगाए है, कैशलेश भारत सही तो कोई कह रहा बीजेपी की चाल. जिस फेसबुक और ट्वीटर पर एक-दूजे पर आरोप-प्रत्यारोप का बहस चलता था, अब वहां पर भी नोटबंदी का चर्चा चल रहा है. पहली बार ऐसा लगा की लोगों को देश की चिंता है पर यह सोंच गलत है क्योंकी लोगों को देश की चिंता नहीं जेब और पैसे की चिंता है. तभी तो सब के सब अपने-अपने धन को बचाने में लगे है, चाहे वह दस हजार वाला हो या फिर दस करोड़ वाला नागरिक. ‘बाप बड़ा न भैया, सबसे बड़ा रुपय्या’ तो सुना था पर आज सबने देख लिया. और आज पैसे के कारण ही संसद को बंद कर दिया गया. लेकिन क्या ऐसा करना देशहित में है. कैशलेश को गलत बतलाकर खुद को बेहतर कहने वाले कालाधन छुपाना तो नहीं चाहते हैं! नहीं तो फिर कैशलेश होने में क्या दिक्कत है. इस ऑनलाइन लेन-देन से घुसखोरी, चोरी या साफ शब्दों में कहे तो भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा. आप सब नेता गण तो भ्रष्टाचारमुक्त भारत चाहते है पर ऑनलाइन लेन-देन से डर क्यूं रहें हैं. इस कैसलेश के कारण अब गरीब और विधवाओं का पेंशन से मुखिया-सरपंच कमीश्न नहीं खाएंगे. कॉग्रेस को तो पक्ष में आना चाहिए क्योंकि इंदिरा आवास, मनरेगा जैसे मजदूर की कमाई पर कोई बिचौलिया हाथ नहीं फेरेगा. और भी बहुत फायदे हैं इसके. सबसे बड़ा फायदा तो यह दिख रहा है कि हरदिन करोड़ो कालाधन रखने वाले पकड़े जा रहे है जिसके कारण देश की आर्थिक स्थिति मजबूत हो रही है. फिर आप बताइए क्या देश को फिर से धनी नहीं बनाना चाहिए? गरीबों का पैसा बिचौलियो को खाने देना चाहिए? कल तक तो आप सब देश को सोने की चिड़िया बनाने पर लगे थे, गरीबों के हक के लिए मरने तक को तैयार थे और अपने चुनाव रैली में घंटों खड़े हो जाते हैं फिर इस सकारात्मक काम के लिए क्यों पैर को पीछे खिंच कर रहे हैं. कहीं डर तो नहीं रहें हैं कि अब नोट के बदले वोट नहीं मिल पाएगा! अरे, हां अब इस कैशलेश के कारण तो चुनाव भी साफ-सुथरा होना तय है. तो फिर आप अपने छवि के दम पर वोट लिजिए ना. अब गरीब लोगों का हवाला देकर कि, उनको नेट चलाने नहीं आएगा, नेटवर्क प्रॉबलम है, स्मार्ट फोन नहीं खरीद पाएंगे अगेरा-वगेरा...बात कर रहे हैं. पर आज के दौर में लगभग हर घर में युवा लड़का-लड़की है, जिनके पास मोबाइल है. जो बहुत गरीब है उसके पास भी किपेड यानि बटन वाला फोन है.जिसके माध्यम आसानी से हम ऑनलाइन पैसा भेज सकते है. कोई बड़ा देशभक्त बनकर फेसबुक पर लिखा कि पेटीएम इत्यादि के द्वारा विदेशी कंपनीयों को फायदा होगा तो हमें इसका विरोध करना चाहिए. पर विरोध के आग में वे भूल रहे हैं कि फेसबुक, व्हाट्सएप भारत का बना हुआ थोड़े ही है, जिसका उपयोग बेझिझक कर रहे हैं. दुसरी बात यह है कि जब आप व्हाट्सएप्प और फेसबुक चला रहे हैं, तो फिर इंटरनेट के माध्यम से बैंकिग और खरीददारी करने में क्यूं हिचकिचा रहें हैं. चैटींग,पोस्ट,ट्वीट करने में तो बड़ा मजा आ रहा है फिर निष्पक्ष तौर से लेन-देन करने का भी आनंद लिजिए, साहब.

Friday, 22 April 2016

कल्याणकारी अर्थव्यवस्था व अधिकार और अम्बेडकर-


कल्याणकारी अर्थव्यवस्था व अधिकार , दो मुख्य शब्द हैं और सरल शब्दों में कल्याणकारी अर्थव्यवस्था की परिभाषा हैं - यह अर्थशास्त्र की सूक्ष्म इकाई हैं , जो की पूर्णरूप से समाज के हित के लिए प्रयोग में लाई जाती हैं और इसका मुख्य उद्देश्य हैं आर्थिक - स्तर के साथ समाजिक विकास करना और दूसरी तरफ अधिकार का शाब्दिक अर्थ हैं - सामाजिक हक़। अधिकार के बिना कल्याण की बात करने का मतलब हैं , जनता को अपने मूल हक़ से वंचित कर देना इसलिए सामाजिक उध्दार में अधिकारों का होना अतिआवश्यक हैं।  डॉ. अम्बेडकर  विचारों पर गौर करे तो इनका विषय के साथ पारस्परिक सम्बन्ध निष्पक्ष दिखाई देता हैं और सन 1949 में भारत के नियंत्रक - महालेखा के समक्ष प्रस्तुत  उनका  यह कथन " आप निवेश कीजिये और नियम - कानून भी लगाईये परन्तु यह मत भूलिए की उसका सीधा सम्बन्ध लोगो के जरूरतों के साथ होना चाहिए। "  इस बात की पुष्टि भी  करता हैं। कल्याणकारी समाज निर्माण में डॉ. अम्बेडकर का समाज के साथ सम्बन्ध बड़ा पुराना हैं और जैसे - जैसे हम आगे की ओर  बढ़ेंगे  , वैसे - वैसे इनके कामों से हमारे सम्बन्ध भी प्रगाढ़ होते जायेगा।
जन्म - जीवन :- " कोयले की खान से हीरा और कीचङ में कमल " का निकलना जनमानस ने देखा है लेकिन हिंदूओं के जातिगत दलदल से कोई कोहनूर निकलेगा, उस दौरान यह कल्पना करना भी मानवीय सोच से परे था ।सदीयों से वीर - पुरुषो की जन्मभूमि रही भारत ने 14 अप्रैल सन् 1891 को महू  (म .प्र .) की धरती पर अंग्रेजी सेना सूबेदार रामजीराव (पिता) व माता भीमा बाई के चौंदहवे संतान के रूप में डॉ.भीमराव अम्बेडकर  जन्म लिए लेकीन मूलरूप से गांव आम्बवेद , रत्नागिरी ,महाराष्ट्र के निवासी थे ।भीमराव के कुशलता से प्रभावित होकर उनके ब्राह्मण शिक्षक ने  इनके नाम के साथ अम्बेडकर जोङ दिया ।यह महार जाति के थे जिनको शूद्र ( अछूत ) माना जाता था और यह हिन्दू धर्म के चौथे पायदान थे ।हिन्दूओं के जातीय रोग को दूर करने के लिए अंतिम में बौद्ध धर्म को स्वीकार कर समाज के लिए प्रगतिशील प्रेरक बने और इसके बाद जात - पात की बंधक रूपी  दुनिया से लोग धीरे - धीरे स्वतंत्र होने लगे ।
शैक्षणिक जीवन काल: - ऐसा  कोई भारतीय और गैर - भारतीय नहीं होगा कि जो इस आधुनिक भारत के पिता के शिक्षा से अवगत  ना हो ।क्योंकि इनके शोध कार्य आज के समय में हमारे लिए किसी ऐतिहासिक धरोहर से कम नहीं ।इनकी शैक्षणिक कामयाबी का सफर सन् 1896 में इनके ही गांव के प्राथमिक विद्यालय, दापोली से शुरु हुआ और सन् 1913 में बम्बई विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री हासिल किए ।अछूत होने के वजह से कक्षा में सबसे पीछे बैठने के बाद भी अपनी कुशल व एकाग्रचित स्वभाव के कारण हमेशा अव्वल स्थान हासिल किए और आज के समाज में इसका प्रभाव पङा, तभी तो आगे - पीछे बेंच पर बैठने की अवधारणा छोङ कर हम बस अपने लक्ष्य के लिए पढ रहे है ।इनकी कुशलता को ऊँचाई देने के लिए बङोदा नरेश ने तीन साल के लिए छात्रवृति प्रदान की और उच्च - शिक्षा के लिए अम्बेडकर विदेश चल पङे । 10 जून सन् 1916 को कोलंबिया विश्वविद्यालय ने अम्बेडकर को अर्थशास्त्र के क्षेत्र में डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया और फिर वे डॉ.  भीमराव अम्बेडकर बन गए । सन् 1923 में डॉक्टर इन साइंस और सन् 1927 में अर्थशास्त्र के क्षेत्र में डॉक्टरेट की ख्याति से लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स ने उनको सम्मानित किया और इतना ही नहीं उनके शोध कार्यो को गहनता से पढे तो वह खुद ही एक विशेष विषय की तरह है ।
             बचपन से ही वे समाज की कुप्रथा  जूझे और सन् 1906 में बचपन में उनकी शादी रमाबाई से हुई और छः साल बाद पिता भी बन गए । मजबूरीयों के बावजूद भी अपने लक्ष्य के प्रति संघर्षशील रहे क्योंकि उनके पिता ने कहा था कि " अम्बेडकर यदि समाज में समानता चाहते हो तो तुम्हें उच्च शिक्षा ग्रहण करना चाहिए । " इनके बचपन के जीवन पर गौर तो  हमे कुण्ठित भीङ से अलग एक नई दिशा देने वाले अम्बेडकर साहब दिखाई देंगे जो आज भी मार्गदर्शन कर रहे है ।
समाजिक उत्थान में अम्बेडकर :- बाबा साहेब के शैक्षणिक शोधों व राजनीतिक जीवन पर गहनता व दूरदर्शिता के साथ देखने पर उनके सम्पूर्णं कार्यकाल का सम्बन्ध कल्याणकारी अर्थव्यवस्था व सामाजिक हक़ के साथ दूध जैसा साफ दिखता है, लेकिन ग्वाला के नजर से आकलन करने लगे तो, आज के नवीनतम कामो में डॉ. अम्बेडकर के कल्याणकारी विचारों के मिश्रण को छुपा दिया जाता है क्योंकि इतिहास बताता है कि किसी ग्वाला ने दूध में पानी मिलाने की बात को स्वीकार नहीं किया है ।लेकिन डॉ.अम्बेडकर ने जो इतिहास के पन्ने पर लिख दिया है, वो अमिट है ।तो आइए  पैनी व विश्लेषित नजर डालते है, इनके अमिट - समाजिक कार्यों पर जो कि निम्नलिखित है -
01- शैक्षणिक शोध कार्य - 
डॉ. अम्बेडकर पहले भारतीय थे जिनको विदेश में अर्थशास्त्र के क्षेत्र में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त हुई ।जब उन्होंने अर्थशास्त्र में एक शोधपत्र लिखा " भारत का आर्थिक इतिहास 1765 से आजतक " तो उनके अर्थकारी आंदोलन को देखते हुए प्रोफेसर शेलीगमन ने कहा " सच में तुम्हारी लङाई लाजपत राय के 'होम रुल लीग ' से बहुत ही मुश्किल लेकिन फलदायक है ।"  एक और उनके प्रभावकारी शोध " रुपये की समस्या " के आधार पर 01 अप्रैल सन् 1935, को भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना हुई और यह भारत के आर्थिक  उत्थान के लिए सफल सिध्द हुई और इसके साथ ही डॉ. अम्बेडकर सफल अनुभवी साबित हुए । इतना ही नहीं " भारत का राष्ट्रीय लाभ " यह शोध भी समाज के हित में रहा और राष्ट्रीयकरण योजनाओं के बारे में उनकी सिध्दकारी बातें निम्न है -
-- उद्योग का राष्ट्रीयकरण
-- बैंक का राष्ट्रीयकरण
-- जीवन बीमा का राष्ट्रीयकरण

              राष्ट्रीयकरण योजनाओं के पहले उन्होंने कहा था कि "राज्य को अपने आय के अनुसार ही निवेश करना चाहिए " । लेकिन यह बात उस समय समझ में आई, जब भारत ने अपना साठ टन सोना गिरवी रखा । ठिक इसी तरह हम उस समय तो राष्ट्रीयकरण नहीं किए और आज एक दशक के बाद इनके विचारों के साथ काम कर रहे है । आज के समय में हमारे यहाँ सरकार व गैरसरकारी उद्योग, जीवन बीमा पॉलिसी, बैंक राष्ट्रीय स्तर पर पहुंच कर देश को आर्थिक रूप से मजबूत कर रहे है और साथ ही साथ रोजगार के अवसर बढ रहे है ।अगर बीसवीं सदी के महानायक अम्बेडकर के विचारों साथ हम चले होते तो आज हमें अपने देश के विकास के जागरूकता के लिए अमेरिका, जापान जैसे विकसित देशों के उदाहरण देने की जरुरत ना पङती ।देर सही पर मौजूदा समय पर प्रधानमंत्री जन - धन योजना, जीवन बीमा और अटल पेंशन योजना और अन्य कल्याणकारी योजना भी किसी ना किसी रूप से इनके विचारों से जुङी है और आज गरीबों का अधिकारिक  उध्दार हो रहा है ।
02-कृषि क्षेत्र में अम्बेडकर :- ' भारत कृषि प्रधान देश है और यहाँ का किसान देश का बेटा है ।' ऐसी प्रभावकारी मोहनी बातें इतिहास के साथ पढने व सुनने को मिला है लेकिन 
डॉ. अम्बेडकर ने कृषि की विफलता को लेकर एक पुस्तक " भारत में अल्पभूमि व उनके उपाय " और कृषि कल्याण के लिए निम्न तथ्य व्यक्त किए :-
भूमि सुधार एजेंडा :- उन्होंने कहा कि हमारे अधिकांशत जमीने जमींदारों व बंधको के अधीन है और यह एक प्रथा बन चुकी है । फिर उन्होंने अपनी पुस्तक " राज्य और अल्पसंख्यक " में उल्लेख किया कि " बिना भेदभाव के भूमिहीनों को पट्टे पर जमीन दी जानी चाहिये "।
सामूहिक खेती :- उन्होंने कहा कि भारत के खेत कई टुकङे में बँटे है जिसके कारण हम सही ढंग से खेती नहीं कर सकते है ।जब हम फार्म के पैमाने पर खेती करेंगे तो हम अपनी उत्पादन क्षमता बढा सकते है ।
आधुनिक कृषि पद्धति :- हमारे पास जमीन तो सीमित है और इनको बढाना भी असम्भव है ।लेकिन आधुनिक कृषि - यंत्र, उच्च नस्ली  बीज व रासायनिक खाद के साथ अन्न की उत्पादन क्षमता को बढा कर कृषि पर निर्भर हो सकते है ।
             इनकी बातों का असर आजादी के कुछ साल बाद दिखा और सरकार ने कृषि  वित्तीय सहायता उपलब्ध कराया व भूमिहीनों को पट्टे पर जमीन देकर जमींदारी - प्रथा पर काबू पाया गया ।जमींदारों के वजह से समाज में एक अलग तरह का बटँवारा हो गया था , जिसके कारण समाज में असमानता व्याप्त थी और पिछङे लोगो के साथ - साथ समाज का विकास रथ रूका था लेकिन जैसें ही सरकार ने ठोस कदम उठाए लोगो को उनका जमीनी हक दिलाने और अन्न की उत्पादकता को बढाने में राज्य के प्रति लोगो की आस्था बढी और सरकार व अम्बेडकर के विचारों का समावेश के साथ ही समाज विकास - रथ पर सवार होकर अपने अधिकार के साथ गतिमान हुआ । आधुनिक कृषि का मूलमंत्र देकर समाज का कल्याण के कार्य जारी  है ।
03-राजनैतिक - समाजिक कार्य: - एक आदर्शवादी समाजिक नेता की तरह डॉ. अम्बेडकर  अपने आंदोलन का नेतृत्व करते थे और राजनीति में उनकी आस्था भी थी । सन् 1936 में जब वे " स्वतंत्र मजदूर दल " की गठन के बाद बम्बई विधान सभा चुनाव में पन्द्रह सीट जीत कर यह साबित कर दिये कि वह कुशल नेता है ।आज के भारत में भी इसी तरह के मजदूर संघ , महिला मोर्चा, छात्र दल इत्यादि तरह के राजनीतिक संगठन अपने अधिकार व सामाजिक रक्षा के लिए कार्यरत है ।नासिक आंदोलन के दौरान दलितों पर हींसात्मक हमले हुए लेकिन एक सभ्य राष्ट्रवादी नेता  का परिचय देते हुए कहा कि " कोई मुझे देशभक्त कहे या देशद्रोही  फिर भी मैं भारत के हितों के खिलाफ एक काम नहीं करुँगा ।" उन्होंने यह साबित किया कि शांति - आंदोलन ही समाज के पक्ष  में है , जो कि निम्नलिखित है :- 
समानता के लिए आंदोलन:- भारत जातिगत आधार पर कई टुकङो में खण्डित है  । 
डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि " जब तक हमारा समाज जातिवाद के टुकङो में खण्डित है तब तक हम चाहे आधुनिक तकनीक लाए या यंत्र, विकास सम्भव नही है और समाजिक समानता के लिए छुआछूत की मनुस्मृति को भस्म कर के ही हम सुसंगठित रुप से संघर्षशील हो सकते है । " सन् 1928 में साइमन कमीशन के सामने भी मौलिक अधिकार के लिए आवाज उठाई और  उन्होंने कहा कि " समाज सार्वजनिक क्षेत्र है और यहाँ पर सबका समान हक है ।"
              भले ही समाजिक समानता व स्वतंत्रता के आने में देर लगी लेकिन उनका  यह आंदोलन प्रभावशाली सिध्द हुआ और आज के समाज में इसका प्रमाण हमें मौलिक अधिकार के रूप में मिला है ।अगर यह आंदोलन फलदायक नहीं होता तो हम अपनी स्वेच्छानुसार शिक्षा ग्रहण नही कर पाते, समाजिक बात कह नही पाते, अन्याय के खिलाफ आवाज नही उठा पाते और ना ही हम समाजिक तौर पर आजाद रहते तो ऐसे में हम विकास की दुनिया से अलग होते ।सूचना का अधिकार का श्रेय भी बाबा साहेब अम्बेडकर को ही जाता है ।अनुभव से देखने पर पता चलता है  की समाजिक समानता के बाद हमारे देश की विकास दर आगे की ओर बढता ही चला है । आज भी कुछ लोग सरकारी - तंत्र के कमी के कारण  जागरूकता के अभाव में अधिकारों से वंचित रह गए है, जो कि समाज के पक्ष में नहीं है । अधिकारों से वंचित लोगो के लिए 
डॉ. अम्बेडकर का एक और विचारणीय व अनुभवी कदम, निबंध के विषय को प्रकाशमय कर रहा हैं :-
पिछङे - वर्ग को आरक्षण :- पिछङे - वर्ग के लोगो के लिए 
डॉ. अम्बेडकर ने विशेषाधिकार देने की बात कही जिसे आज हम आरक्षण के रूप में देख रहे है ।आरक्षण एक प्रकार का प्रोत्साहन है, जो कि दबे तबके के लोगो को आत्मबल देता है ।आरक्षण की बात से उच्च वर्ग के लोगो के मन में नकारात्मक सवाल आए की यह कैसी समाजिक समानता है ? लेकिन जिस समानता के अधिकार की  बात हो रही थी, तो  उसके बीच में आर्थिक तंगी व शिक्षा के अभाव से एक विशाल गड्ढा बन गया था और उसका समतल करने का उपाय था कि पिछङे - वर्ग के लोगो को आर्थिक व सामाजिक सहायता प्रदान की जाए ताकि वे भी शिक्षित व आत्मनिर्भर बने और समाज वास्तविक रूप  से सुसंगठित , शिक्षित और संघर्षशील बने ।समय के साथ आरक्षण का सकारात्मक परिणाम आया और धीरे - धीरे पिछङा समाज शिक्षित बनकर अपनी योग्यता के अनुसार सरकारी और गैर - सरकारी संस्थानों में प्रवेश कर लिया और आश्चर्यजनक परिवर्तन देखने को मिला कि उच्च वर्ग के लोग , निम्न स्तर के लोगो से मिलने लगे । भारत की आधी से भी ज्यादा आबादी पिछङे - वर्ग की थी और संयोगवश वे सभी दलित थे और उनको छोङकर के विकास करना असंभव था । 
महिलाओं के लिए विशेषाधिकार :- पिछङे - वर्ग में केवल दलित नहीं बल्कि महिलाएँ भी शामिल थी । हालांकि भारतीय महिलाओं के शोषण के खिलाफ आंदोलन करने वाले 
डॉ. अम्बेडकर पहले भारतीय नहीं थे । इनसे पहले राजाराम मोहन राय सती प्रथा के खिलाफ आवाज उठा चूके थे ।लेकिन महिलाओं के समाजिक हक व समानता के लिए आंदोलन करने वाले  डॉ. अम्बेडकर वाले पहले भारतीय थे , जो कि महिला वर्ग का सर्वांगीण विकास चाहते थे ।चाहे उच्च स्तरीय जाति के पुरूष हो या  निम्न वर्ग के, वे महिलाओ से  समाज  में मजदूरी करवाते वक्त शर्म  नही महसूस करते थे ,  लेकिन उस समय की औरतों को समाज में समानता देने का मतलब पुरुष वर्ग का मर्यादा भंग करने  जैसा मानसिकता पाल रखे था । महिला वर्ग के संघर्ष को देखते हुए  बाबा साहेब अम्बेडकर ने पुरुषो को महिलाओं का महत्व समझाया और बिना नारी समुदाय के  समाज को आगे  नहीं  बढाया जा सकता है, यह  एक  सार्वभौमिक  सत्य है ।हमारे समाज में  नारीयों को इतना  शोषित कर दिया गया था कि उनके  मन  से  डर निकालना आसान  काम नहीं था, इसलिए अम्बेडकर साहब ने उनके मनोबल को बढाने के लिए उनको समाज में विशिष्ट अधिकार देने के  लिए , उन्होंने सन् 1928 में बम्बई विधान परिषद में महिला प्रसूति अधिनियम विधेयक पेश किए ताकि उनको गर्भवती होने के बाद आखिरी महीने से { प्रसव माह } छुट्टी मिले और मजदूरी भी दिया जाए और हिन्दू कोड बिल  भी मुख्य रूप से महिलाओं उत्थान के लिए था लेकिन हिंदूओं ने इसका विरोध किया और आखिरकार इक्कीसवीं सदी के भारत में संशोधन के बाद , इन नियम को किसी अन्य रूप  लागू  किया जा रहा हैं तो महिलाओं को भी समाजिक अधिकार मिलने लगे है ।आज हम महिला सशक्तिकरण को बढाने में लगे हुए है और समाज के हर क्षेत्र में महिलाएँ अपने अधिकार का प्रयोग कर के अपना पहचान बना रही है और आज समाज के निर्माण में अहम भूमिका निभा रही है । तो इस तरह हम कह सकते है कि उनके आरक्षण का मुख्य उद्देश्य दलितों के लिए नहीं बल्कि केवल समाज के शोषित वर्ग में समरूपता लाने के  लिए ही था ।
            आरक्षण ने हमारे देश को मूलरूप से एक नया आयाम दिया और जनता में सामाजिक भावना जागृत हो गई और साथ ही साथ आर्थिक रूप से भी हितकारी सिध्द हुई और आज भी सरकार दलितों के विकास के लिये अग्रणी है । इस तरह से 
डॉ. अम्बेडकर के विचारों ने समाज के कमजोर व्यवस्था को मजबूत बनाने के साथ ही अधिकार को भी सुरक्षित कर दिया ।
राजनीति में आम आदमी के लिए आरक्षण :- लोकतंत्र की नींव राजनिति के आधार पर खङी है और जनता के द्वारा चुने गए प्रतिनिधि ही लोकतंत्र का बागडोर संभालने के लिए कार्यरत रहते है, लेकिन डॉ.अम्बेडकर ने कहा कि "राजनीति में जब तक आम आदमी के लिये कुछ निर्वाचन क्षेत्र  आरक्षित नहीं होंगे तब तक दबे हुए वर्ग का राजनीतिक विकास नहीं हो सकता ।" ऐसा  विचार राष्ट्र के प्रति संघर्षशील सोंच को बयाँ करता है और केवल मताधिकार से लोकतंत्र का विकास करने का  मतलब यानी कि एक लोकतंत्रात्मक राजतंत्र का निर्माण । क्योंकि लोकतंत्र की सीट पर तो फिर केवल किसी एक वर्ग का आधिपत्य हो जाएगा और आम जनता बस मतदान करने के लिए ही रह जाएगी ।  सन् 1932 में 
डॉ. अम्बेडकर के नेतृत्व में पूना समझौता  हुआ जो कि मुख्यतः दलितों के आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र के लिए था लेकिन गांधी जी ने इसका विरोध किया और आमरण भूख हङताल पर बैठे और आखिरकार डॉ. अम्बेडकर मजबूरवश पीछे हो गए, लेकिन आधुनिक भारत में इसका परिणाम हमें लोकतंत्र के पक्ष में देखने को मिला और आज की राजनीति में महिलाओं के साथ - साथ निम्न वर्ग के लोग भी शामिल है । आज भी जातिगत आधार पर मतदान तो होता है, परन्तु किसी खास वर्ग का जो एकाधिकार था, वो अब खत्म हो रहा है । अब आम लोग अपने अधिकार का प्रयोग कर के अपना व समाज का कल्याणकारी निर्माण कर रहे है और यह डॉ. अम्बेडकर की असाधारण सफल अनुभवी विचार का परिणाम है ।
निष्कर्ष :- डॉ.  भीमराव अम्बेडकर के विचारों को लागू करने में हम तो एक दशक लगा दिये  तो फिर शब्द सीमा के अंदर उनके पूरे कल्याणकारी अर्थव्यवस्था के विचारों को व्यक्त करना संभव नहीं है लेकिन मैंने उनके  बचपन से लेकर आंदोलनकारी जीवन को पढा तो यह प्रतीत हुआ कि उनका तो सम्पूर्ण  जीवन ही समाजिक उत्थान के लिए कार्यरत था या यूं कहे कि जितना जीयें नहीं उससे कई गुना ज्यादा राष्ट्र- समाज के विकास के लिए संघर्ष किये ।चाहे उनके शैक्षणिक - शोध , राजनीतिक आंदोलन और लेखनी की बात करे तो उन सबका सम्बन्ध किसी न किसी रूप में समाज के आर्थिक व  सामाजिक विकास के लिए जुङा  हुआ  है , साथ ही साथ आम जनता का विशिष्ट ख्याल भी रखा  उन्होंने । डॉ. भीमराव अम्बेडकर एक अर्थकारी क्रांति के प्रतीक है और आने वाले समय में भी उनकी विचारधारा , और भी ज्यादा प्रभावित करेंगी ।भारतीय  समाज आज आधुनिक युग में उनकी सिध्दकारी संघर्ष के बदौलत ही है । जिस सोंच के साथ वो देश का चौतरफा विकास चाहते थे, वैसी कल्याणकारी विचारों को व्यक्त करने के लिए उपयुक्त शब्द तो नहीं है लेकिन इतना तो अनुभव के आधार पर कह सकता हूँ कि हम अपने घरेलू समस्या से निपट नहीं पाते है परन्तु बाबा साहेब अम्बेडकर ने समाजिक समानता  के लिए एक ज्योतिर्मय परिवर्तन की आग जलाई , जिसमें असमाजिक तत्व जल रहे है और जरूरतमंद व शोषित वर्ग उस अधिकार रूपी प्रकाश से खुद का समाजिक जन - जीवन स्वतंत्रता से जी रहे है । डॉ. अम्बेडकर ने अपने अनुभवी अध्ययन के मुताबिक वो सारी बातें बताई जिससे कि एक स्वस्थ व सुसंगठित समाज का निर्माण किया जा सके और आज हम अपने आधुनिकीकरण के कामयाबी को देखते हुए यह तो निस्संदेह कह सकते है कि उनकी सोंच गहनता के साथ अनंत काल तक की सोंच है, जो कि केवल अतिविशिष्ट मानव में ही पाई जाती है ।जिस तरह से डॉ. अम्बेडकर अपने अनुभव से आगे निकल गए और हमारे लिए भी पथप्रदर्शक बने है तो अगर आज के छात्र जीवन को अनुभव के आधार पर बयाँ करे तो देखेंगे कि हम मजबूरीयों के वजह से पढाई छोङ देते है और  मौत के डर से समाजिक आंदोलन लेकिन बाबा साहेब ने तो मजबूरीयों को ही संसाधन बना कर शिक्षा भी ग्रहण कर लिये और अकेले लङकर हमें  नया समाज दिये ।
आधुनिक भारत के पिता 
डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर के जीवन को कुण्ठित मानसिकता से अलग कर के देखा जाए तो इनका पूर्णं जीवन ही समाजिक कल्याण के लिए पूर्णंरुप से समर्पित दिखता है । इनसे बेहतर कोई  भारतीय नहीं है, जो कि आर्थिक - तंगी व अधिकारों से वंचित हो कर भी समाज के  आर्थिक व सामाजिक विकास के लिए अविराम संघर्ष किया हो ।डॉक्टर अम्बेडकर ने हमे समाजिक असमानता  के कुँआ से बाहर निकालने के लिए समानता व स्वतंत्रता की सीढीयों के साथ अर्थव्यवस्था की कुँजी देकर हमारे सार्वजनिक इच्छाओं को पूरा किये  और एक सच यह भी है कि समाजिक  - समानता के साथ आर्थिक विकास भी होना  चाहिए नहीं तो हमारी आर्थिक मजबूरी हमें फिर से गुलाम बना लेगी तो ऐसे में समाजिक - समानता व अधिकारों का कोई मोल नहीं रह जाएगा । भारत को शैक्षणिक , राजनीतिक,  आर्थिक और सामाजिक रूप से सुसंगठित बनाने के लिए डॉ. अम्बेडकर ने  हमारे समाज को एक समतल भूमि की तरह तैयार किया ,जिस पर आज हम सब अपने अधिकार के साथ खङे है ।भारतीय जन - समूह के आर्थिक व सामाजिक विकास के लिए अंदर अपने  विचार व मत को निश्चित रूप से अधिकार के तहत लागू करने के लिए उन्होंने अपने वास्तविक अनुभव के आधार पर शोध किया और समाज के भिन्न - भिन्न पहलुओं पर अपना शोधात्मक व्यक्तव्य प्रस्तुत किया और इनकी बातों से केवल भारतीय ही नहीं बल्कि विदेशी भी प्रभावित हुए क्योंकि  इन्होंने आकर्षक व बनावटी बातों को दरकिनार करके हमारे समाज के विफलता  के कारण पर जोर दिया और साथ ही साथ उनके सुधार के लिए भी शोधकार्य के साथ तर्क दिया ।भारत को वास्तविक तौर पर आधुनिक बनाने के लिए हमें इनकी तरह दूरगामी सोंच के साथ इनके द्वारा दिए अधिकारों का दायित्व से उपयोग करना चाहिए और बाबा साहेब अम्बेडकर ने तो  हमारे लिए कल्याणकारी अर्थव्यवस्था के समाज को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए जिन अधिकारों को सुनिश्चित किये है, तो समाज के  पक्ष में हमें भी निष्पक्ष व निष्ठावान ही रहना चाहिए ताकि हमारा समाज औरों के लिए भी पथप्रदर्शक सिध्द हो और आधुनिक भारत के पिता डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर को सच्चे मन से श्रध्दा - सुमन अर्पित करते रहे । ऐसे असाधारण महानायक के लिए समर्पित मेरी कविता " नव भारत का विधाता वो " की चंद पंक्तियाँ –

“सोंच से ही बदल  दिया, गाँधी जैसो की गाथा वो,
आमरण  जोङा रहा, दबे - तबको से नाता वो,
संविधान से दे गया, अधिकारों का ताँता वो, 
अम्बेडकर नहीं, हैं युगम्बर, नवभारत का विधाता वो । ।”

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Monday, 28 March 2016

निर्भया अभी जिंदा है. लूटने या इन्साफ के लिये !

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दिल्ली की दिसम्बर ठण्ड से भरी रहती है, कोई ठंड से तो कोई काम से सो नही पाता है. वैसे भी दिल्ली में भाग दौड के बिना रोटी का मिलना मुश्किल है. लेकिन इस भीड़ भाड़ की दिल्ली में भी कोई लड़की सुरक्षित नहीं हैं, ना घर में ना रोड पर .                                             12 दिसंबर 2012, की रात को भला कौन भूल सकता है. खैर आपने व्यस्तता के कारण भूला दिया होगा लेकिन निर्भया की मां कैसे भूल सकती है, वह कलमुहा दिन. क्योंकि बेटा बेटी को खोना दुर्भाग्य होता है लेकिन अपनी बेटी को बलात्कार का शिकार होते देखना, क्या इससे बडा भी दुर्भाग्यपूर्णं कुछ होगा किसी भी मां बाप के लिये. निर्भया की मां ने कभी भी नही सोचा होगा की 23 साल से सिंच संजो कर रखी बेटी को इस तरह विदाई देना पडेगा. उसकी मां ने तो एक एक दिन जोडा होगा की अब मेरी बेटी आयेगी डीग्री, जॉब लेकर और इसी ख्वाब के साथ तो हर किसी के माता पिता जिंदा रहते है. लेकिन 04 साल से ऐसा ख्वाब नही आया और ना ही आयेगा, निर्भया की मां को. निर्भया कोई पहली लडकी नही है जिसके साथ सामूहिक बलात्कार हुआ क्योंकी इससे पहले भी लगभग 66 बलात्कार प्रतिदिन हुये थे और निर्भया के केस के बाद 90 बलात्कार प्रतिदिन हो ही रहे है. एक प्रकार से देखा जाये तो निर्भया के केस के बाद हम एकजुट व जागरुक दिखे लेकिन नेशनल क्राइम रिकॉर्डस ब्यूरो ने जब शोध कर के आंकडा दिया की निर्भया के केस के बाद बलात्कार दोगुना बढ गया है. यानि की हर 14 मिनट पर कोई निर्भया तो कोई दामिनी लुटी जा रही है, दम तोड रही है. लेकिन जिस दिल्ली में हम इसका विरोध किये वही दिल्ली इस क्राइम के क्षेत्र में पहले स्थान पर है. जन आंदोलन कर के हम लोगों ने विरोध किया और अपराधियों को गिरफ्तार भी करवाया लेकिन आंकडे तो कह रहे है कि हम आज भी खामोश है. निर्भया का केस एक आधार बन गया रेप क्राइम एजेंसी, मीडिया व आंदोलन करने वालों के लिये लेकिन बलात्कार तो अपने रफ्तार से बढता ही जा रहा है. हम कहीं ना कहीं सिर्फ अपने कार्य क्षेत्र व दायित्व के दायरे में सिमट कर रह गये है और समाजिक कर्तव्य को भूला बैठे है. अगर हमें इस बात का ख्याल रहता की निर्भया, दामिनी मेरी अपनी है तो फिर बलात्कार कम होते और अगर रेप होते भी तो हम उन बलत्कारियों को सजा देने के लिए त्वरित फैसला लेते और सब के लिए समान सजा होना चाहिये. क्यूँकि अगर कोई बच्चा होकर यह जान सकता है कि सेक्स कैसे करते है और यही मौका है रेप करने का तो फिर क्या वह बच्चा है. यह कैसा बच्चा है जो व्यस्कों का काम निडर हाेकर करता है. बलात्कार तो बस बलात्कार ही हैं, तो फिर उनको बचाना क्यों, एेसे में बलात्कारी का मनोबल बढेगा ही बढेगा. अन्य चीजों से तो बचने का अवसर भी है लेकिन विश्वास के आड में होने वाले बलात्कार से नारी कैसे बचेगी. अब नारी किससे - किससे बचेगी क्योंकि उसको नोचने वाला बाप, भाई, शिक्षक और अजनबी सब मौके के आड में बैठे है. ऐसे में नारीयों को खुद के ऊपर भरोसा कर के चलना ही बेहतर है, क्योंकि इस लचर व्यवस्था को बेहतर होते - होते तो जाने कितनी निर्भया शिकार हो जाएँगी और नारीयों को मुद्दा बना कर उपभोग होता रहेगा. जाने कितनी निर्भया निर्भय हो कर तमाम क्षेत्र में जज्बें के साथ काम कर रही हैं फिर भी किसी कोने में कोई दामिनी, सूर्यनेल्ली और निर्भया जिन्दा हैं, इंसाफ के इंतजार में या लूटने के लिए, यह बता पाना मुश्किल हैं.